इंटरनेट के खुलेपन से बंद – जिंदगी की लयबद्धता…

इंटरनेट के दुष्परिणाम

          कुछ दशक पहले तक स्त्री-पुरुषों के शयनकक्ष में चलते अंतरंग शारीरिक संबंधों के बारे में जानने की उत्सुकता की पूर्ति के ऐसे कोई आसान माध्यम उपलब्ध नहीं थे जिनके द्वारा कोई भी युवा आनन-फानन में विवाहितों के शयनकक्ष में झांककर अपनी उत्तेजना को बेवजह हवा दे पाते । बेशक मस्तराम टाईप का पोर्न साहित्य तब भी रेल्वे-स्टेशनों के क्षेत्र में छोटी-छोटी और अत्यंत मंहगी किताबों के रुप में बिकते दिख जाता था लेकिन बंदिश यह होती थी कि न तो बेचने वाला पुलिस के डर से उन्हें खुले-आम बेच पाता था और न ही खरीदने वाला खुलकर हर किसी पुस्तक विक्रेता से उसकी मांग कर पाता था । जाहिर है तब इसी ढंके-छुपे वातावरण में रहने वाली जनरेशन की सेक्स-लाईफ में सामान्यतः कोई पेचिदगियां देखने में नहीं आती थी । लेकिन इंटरनेट के आने से…

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इंटरनेट से अश्लीलता

 

सेक्स गतिविधियों का प्रसार

        किंतु वर्तमान समय में विज्ञान की बढती पहुंच के कारण छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में भी इंटरनेट युक्त स्मार्ट मोबाईल पहुँच गये हैं और इस इंटरनेट की देन के रुप में दुनिया भर में बन रही पोर्न मूवीज व सरिता भाभी टाईप की सेक्सी कहानियां धडल्ले से हर उम्रवर्ग की जनरेशन के द्वारा अपने इच्छित समय व स्थान पर देखी जा रही है । अब यदि किसी ने 1970 के आसपास के दशक की वो मस्तराम टाईप की किताबें देखी-पढी हों तो वो आसानी से समझ सकता है कि युवा होते किशोरवय के बच्चों द्वारा वह किताब पढ लेने पर उपजी अपनी उत्तेजना व बैचेनी को शांत करने के लिये उसी समय उनके द्वारा हस्तमैथुन करना कितना आवश्यक हो जाता था ।

 

इंटरनेट से शोषण

बलात्कार को बढावा

          ऐसे में अब इंटरनेट की मदद से जो खुलापन इस गोपनीय विषय में हमारे सामने चल रहा है, उसका दुष्परिणाम ये है कि आए दिन कम उम्र के दबंग युवाओं द्वारा रास्ते चलते किसी लडकी को घेरकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार कर अपनी उस उत्तेजना को शांत करने की कोशिश करना, और नतीजा भी हमारे सामने ही है अक्सर ऐसे मामलों में फंस जाने वाली लडकियां अपनी जिंदगी गंवाकर किसी निर्भया के रुप में हमारे सामने आ रही हैं और ये युवक भी अपने उन कृत्यों की सजा के रुप में अपनी शेष जिंदगी जेल के सींखचों के पीछे अथवा वहशीयत के उस दौर में स्वयं उन्होंने या उनके किसी साथी ने हैवानियत की हद यदि पार करदी तो पुलिस एनकाउंटर अथवा फांसी की सजा पाकर वे भी अपनी जिन्दगी गंवा ही रहे हैं ।

           सभी इतने दबंग भी नहीं होते कि वे किसी युवती को घेरकर अपनी कुत्सित कामना की पूर्ति कर लें, तो वे 3-4 साल से लगाकर 6-8 साल की उन अबोध बच्चियों को उठाकर उनके द्वारा अपनी इन कुत्सित यौन पिपासा को शांत करने का प्रयास करते देखे जा रहे हैं और नतीजा यहाँ भी यही सामने आ रहा है कि लडकी अपने जीवन से हाथ धो रही है और पकडाने वाला आरोपी भी उपरोक्त परिणाम को ही प्राप्त कर रहा है ।

          वे युवा जो अधिकांशतः अपने पारिवारिक संस्कार अथवा अन्य किसी कारण से ऐसा कोई दुःसाहस नहीं कर पाते वे अपने आपमें ही “सूत न कपास – जुलाहे से लट्ठमलट्ठा” की तर्ज पर नित्य पोर्न फिल्में व कहानियां देखकर व पढकर येन-केन प्रकारेण निरंतर हस्तमैथुन कर अपनी शारीरिक क्षमताओं का नाश कर रहे हैं और ऐसा भी नहीं है कि ये सारी पोर्न फिल्में व कहानियां सिर्फ लडकों को ही बिगाड रही हैं, बल्कि लडकियां भी इन्हें देख व पढकर अपनी उत्तेजना के शमन हेतु यदि किसी युवासाथी अथवा आस-पास के किसी विवाहित से स्वैच्छिक संबंध बना रही हैं तो वो भी अपने बाद के जीवन में उन्हीं साथियों द्वारा किये जाने वाले ब्लेकमेल की शिकार होकर अपनी जिंदगी एक अनचाही घुटन के साथ जीने हेतु अभिशप्त हो रही हैं ।

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          सेक्स जीवन की ऐसी बेतरतीब संतुष्टी का अंतिम खामियाजा वैवाहिक जीवन जो आजकल के सामाजिक वातावरण में वैसे भी अधिक उम्र में हो रहे हैं के बाद सामने आ रहा है जहाँ ऐसे लडके अपनी शारीरिक क्षमता निरंतर हस्तमैथुन कर अपना मनोबल गंवाकर बैठे दिखते हैं और लडकियां अपने विगत के कटु अनुभवों के कारण इस सहजसुख के प्रति एक प्रकार की उदासीनता की भावना के साथ अपने जीवनसाथी के समक्ष होते हैं और तब उनके शेष जीवन में पारिवारिक दबाव पर बच्चे की कामनाओं के साथ ही शारीरिक असंतुष्टी का एक नया दौर प्रारंभ हो जाता है ।

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